guru gobind singh ji
सिख धर्म के बारे में तो आप सभी ने सुना ही है सिख धर्म में बहुत सारे गुरुओं ने अपनी saheedi देकर अपनी sikhखी को सबसे पहले अपना स्वरूप माना है इसी सीखी के लिए गुरुओं ने अपनी saheedi दे दी है
आज हम सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी की जन्म से लेकर शहादत तक उनके बारे में जानेंगे सिख धर्म एक ऐसा धर्म है जिसमें बहुत सारे सिखों ने अपनी saheedi देकर इस धर्म को बचाया है और अपni सीखी को सबसे पहले माना है
चलिए जानते हैं सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी के जीवन के बारे में
1.श्री गुरु गोविंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरु थे
2.गुरु जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 ईस्वी को पटना बिहार में हुआ था
3.गुरु जी की माता का नाम माता गुजरी जी था और पिताजी का नाम श्री गुरु तेग बहादुर जी था
4.जब गुरु जी का जन्म हुआ था उस समय मुगल बादशाह औरंगजेब का शासन चल रहा था
5.गुरुजी के चार पुत्र थे फतेह सिंह जोरावर सिंह जुझार सिंह अजीत सिंह
6.वह गुरु जी के जन्म समय मुगल बादशाह की सेना बहुत जुल्म किया करती थी
7.जब औरंगजेब जबरदस्ती कश्मीर में हिंदुओं के मंदिर गिरवानी लग गया था
8.और सिखों को जबरदस्ती मुसलमान बनने के लिए बोल रहा था उस समय ऐसी स्थिति में कश्मीरी पंडित श्री गुरु तेग बहादुर जी के पास आए थे
9.जब गुरुजी रक्षा के लिए आगे आए उसके बाद मुगल बादशाह औरंगजेब के उद्देश पर श्री गुरु तेग बहादुर जी को दिल्ली में saheed कर दिया गया
10.गुरु तेग बहादुर जी की शaheedi के बाद गोविंद राय को 9 वर्ष की आयु में 11 नवंबर 1675 ईस्वी को गुरु जी की गद्दी पर बिठा दिया गया
11.जब गुरु जी आनंदपुर साहिब में थे उस समय गुरुजी ने 1699 इसवी को बैसाखी वाले दिन खालसा पंथ की साधना की
12.गुरुजी ने पांच प्यारों की स्थापना की इन पांच प्यारों को एक ही कटोरे में प्रसाद पिलाकर सीखी में एकता ka निर्देश दिया
13.गुरुजी ने मुगलों के साथ लड़कर बहुत सारी jango में विजय प्राप्त की
14.1704 ईस्वी को जब गुरु जी ने आनंदपुर साहिब का किला छोड़ा था तब वह उनका परिवार बिछड़ गया था
15.गुरुजी ने चमकौर साहिब में 40 सिखों के समेत दस लाख मुगलों का सामना किया यहां पर गुरुजी के दो साहिबज़ादे बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह शहीद हो गए थे
16.दूसरी तरफ बाबा अजीत सिंह और बाबा जोरावर सिंह जो माता गुजरी जी के साथ थे उनको वजीर खान ने जिंदा नीवों में चिनवा दिया था जिसकी वजह से उनकी शहीदी हो गई थी
17.गुरुजी ने माधवदास को अमृत संचार करवाकर उन्हें बाबा बंदा सिंह बहादुर बनाया और उन्हें पंजाब की तरफ बढ़ रहे जुल्म को खत्म करने के लिए भेज दिया
18.1707 ईस्वी को जब गुरुजी महाराष्ट्र नांदेड़ में थे उस समय दो पठानों ने गुरुजी की पीठ में छुरा maar दिया था गुरुजी ने उस समय एक पठान को तो मार डाला था और दूसरे पठान को गुरुजी के सिखों ने मार दिया था गुरुजी के जख्म ज्यादा होने की वजह से वह शहीदी दे गए थे


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